समय का पहिया और जीवन का संघर्ष
वक़्त की पुकार
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अध्याय 1

वक़्त की पुकार

वक़्त की आवाज़ को पहचानना सीखो तुम, बहती हुई इस धारा में ढलना सीखो तुम। यह न किसी का सगा है, न किसी का मीत है, जो समय को जीत ले, बस उसी की जीत है। थमता नहीं यह पल भर को, न पीछे मुड़कर देखता। किस्मत के कोरे पन्नों पर, यह अपनी स्याही फेंकता। अमीर की हवेली हो या गरीब की कुटिया हो, सबके द्वार पर यह एक समान ही दस्तक देता। समय की गति और मूल्य : बीता हुआ वो कल कभी लौट कर न आएगा, आज जो गँवा दिया, वो उम्र भर रुलाएगा। सूरज की पहली किरण जब खिड़की से झांकती है। वो आलस में सोए हुए इंसान को ही आंकती है। महलों को खंडहर और राजा को रंक बना देता है। शून्य से शिखर तक का सफ़र, यह चंद में सजा देता है। हीरे की परख भी तो वक़्त की मार से होती है, कोयले की कालिख भी तो, वक़्त के संग ही धोती है। सावधान रहने की चेतावनी : मत कहो कि 'कल' करूँगा, कल कभी आता नहीं। वक़्त के हाथों का पंछी, पिंजरे में समाता नहीं। जो सोए रहे चैन से, वो मंज़िलें खो बैठे हैं। जो जागे थे तूफ़ानों में, वो इतिहास बो बैठे हैं। यह रेत की तरह मुट्ठी से फिसलता ही जाएगा, गर पकड़ न पाए इसे, तो बस पछतावा हाथ आएगा। सुनो मुसाफ़िर! वक़्त की शहनाई तुम्हें बुलाती है। हर एक घड़ी जीवन की, एक नई सीख दे जाती है। अभी समय है, अभी शक्ति है, अभी तेरा दौर है, दुनिया की भीड़ में देख, तू सबसे कुछ और है। वक़्त का सम्मान कर, यह तुझे सम्मान दिलाएगा। आज तू इसे थाम ले, कल यह तुझे दुनिया दिखाएगा।

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