वीरान हवेली और धड़कनों की गूँज
शिमला की सुबह दिल्ली जैसी नहीं होती। यहाँ सूरज की पहली किरण जब देवदार के पेड़ों से छनकर आती है।
तो ऐसा लगता है जैसे कुदरत ने सोने की चादर बिछा दी हो।
आर्यन सुबह 8 बजे ही 'विंटेज पैलेस' पहुँच गया था। यह हवेली शहर से थोड़ी ऊंचाई पर थी, घने जंगलों के बीच।
हवेली की दीवारें काली पड़ चुकी थीं, काई जमी हुई थी और लोहे का बड़ा सा दरवाजा हर हवा के झोंके पर कराह उठता था।
आर्यन ने अपना नापने वाला फीता (Measuring Tape) निकाला और सीढ़ियों का मुआयना करने लगा।
तभी, दूर से किसी के गुनगुनाने की आवाज आई।
माहिरा एक पुरानी साइकिल पर सवार होकर आ रही थी। उसके पीछे रंगों की बाल्टी बंधी थी और कंधे पर उसका वही बड़ा सा झोला।
वह 'पुरानी जींस और एक ओवरसाइज्ड स्वेटर' में किसी आजाद परिंदे जैसी लग रही थी।
माहिरा (साइकिल से उतरते हुए): "गुड मॉर्निंग, मिस्टर आर्किटेक्ट!
वैसे इतनी जल्दी आकर क्या दीवारों से उनकी उम्र पूछ रहे थे?"
आर्यन (बिना मुड़े): "वक्त की पाबंदी (Punctuality) नाम की भी कोई चीज होती है। खैर, ये हवेली अंदर से बहुत कमजोर है।
संभलकर चलना, कहीं तुम्हारे इन रंगों के बोझ से कोई छत ही न गिर जाए।"
हवेली के अंदर का मंजर
जैसे ही दोनों अंदर दाखिल हुए, एक अजीब सी ठंडक ने उन्हें घेर लिया। धूल की मोटी परतें और मकड़ी के जालों के बीच भी उस हवेली की भव्यता झलक रही थी।
आर्यन ड्राइंग रूम के बीचों-बीच खड़ा होकर अपने डिजिटल कैमरे से फोटो लेने लगा। माहिरा एक कोने में जाकर बैठ गई और दीवारों को सहलाने लगी।
आर्यन: "क्या कर रही हो? काम शुरू करो, हमें यहाँ का लेआउट तैयार करना है।"
माहिरा (धीमी आवाज में): "पत्थरों को महसूस कर रही हूँ, आर्यन। ये दीवारें रो रही हैं।
यहाँ कभी बहुत शोर रहा होगा, बहुत खुशियाँ रही होंगी... और अब सिर्फ सन्नाटा है। तुम्हें नहीं लगता कि इसे सिर्फ 'नया' बनाना काफी नहीं होगा? हमें इसकी 'रूह' वापस लानी होगी।"
आर्यन रुक गया।
उसने माहिरा की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे वो उन बेजान दीवारों से बात कर रही हो।
पहली बार आर्यन को लगा कि शायद ये लड़की सिर्फ 'बड़बोली' नहीं है, इसके पास एक गहरी सोच भी है।
हादसा और अहसास
काम करते-करते दोपहर हो गई। आर्यन एक पुरानी लकड़ी की सीढ़ी पर चढ़कर छत की नक्काशी देख रहा था। अचानक, पुरानी लकड़ी ने जवाब दे दिया।
'कड़क...!'
सीढ़ी का एक हिस्सा टूटा और आर्यन का संतुलन बिगड़ गया।
माहिरा (चिल्लाई): "आर्यन! संभलो!"
इससे पहले कि आर्यन पत्थर के फर्श पर गिरता, माहिरा ने उसे थामने की कोशिश की। दोनों फर्श पर गिरे, लेकिन आर्यन का पूरा बोझ माहिरा पर था।
आर्यन का हाथ माहिरा के चेहरे के पास था और माहिरा की साँसें आर्यन की गर्दन पर महसूस हो रही थीं।
सन्नाटा इतना गहरा था कि दोनों को एक-दूसरे के दिल की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी। माहिरा की आँखों में डर था और आर्यन की आँखों में एक अनजाना सा अहसास।
आर्यन (हकलाते हुए): "अह... आई एम... आई एम सॉरी।"
वो जल्दी से खड़ा हुआ और अपने कपड़े झाड़ने लगा। माहिरा भी उठी, उसके गाल थोड़े गुलाबी हो रहे थे।
माहिरा (माहौल हल्का करने के लिए): "मैंने कहा था ना, संभलकर! दिल्ली के लोग शायद जमीन पर पैर कम ही रखते हैं।"
एक नया राज
शाम ढलने वाली थी। आर्यन ने अपनी फाइल समेटी। तभी उसकी नजर सीढ़ी के पास टूटे हुए फर्श के एक कोने पर पड़ी।
वहाँ एक छोटा सा लकड़ी का डिब्बा आधा दबा हुआ था। आर्यन ने उसे बाहर निकाला।
डिब्बा पुराना था, जिस पर नक्काशी की गई थी। उसने उसे खोला, तो अंदर एक पीला रेशमी धागा और एक अधूरी चिट्ठी थी।
माहिरा (पास आकर): "ये क्या है?"
आर्यन ने चिट्ठी पढ़ी, जिस पर लिखा था— "मोहब्बत के धागे अगर एक बार उलझ जाएं, तो मौत भी उन्हें सुलझा नहीं पाती।"
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। उस वीरान हवेली में अचानक हवा तेज हो गई।
आर्यन की कलाई पर बंधा वो पीला धागा (जो माहिरा के मफलर से उलझा था) और डिब्बे के अंदर का वो पुराना धागा... दोनों का रंग बिल्कुल एक जैसा था।
आर्यन: "शायद हम यहाँ सिर्फ हवेली ठीक करने नहीं आए हैं, माहिरा।"