प्यार के धागे : Strings of Love ❤️
जलन की आग और अतीत का साया
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अध्याय 4

जलन की आग और अतीत का साया

रोहन की एंट्री आर्यन कुछ पूछता, उससे पहले ही हवेली के गेट पर एक चमचमाती काली एसयूवी (SUV) आकर रुकी। एक लंबा, हैंडसम और स्टाइलिश लड़का गाड़ी से बाहर निकला। उसने डिजाइनर चश्मा पहना था और उसके चेहरे पर एक 'सिटी बॉय' वाला गुरूर था। यह रोहन था, माहिरा का वो बीता हुआ कल, जिससे वो भागकर यहाँ आई थी। रोहन (ऊंची आवाज में): "माहिरा! आखिर मैंने तुम्हें ढूंढ ही लिया। इतनी वीरान जगह पर क्या कर रही हो?" माहिरा सुन्न खड़ी रही। आर्यन धीरे से उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। उसकी नजरें रोहन पर टिकी थीं—ठंडी और चुभती हुई। आर्यन (सख्त आवाज में): "कौन है ये, माहिरा?" रोहन (बीच में टोकते हुए): "मैं रोहन हूँ। माहिरा का फिआंसे... होने वाला पति।" आर्यन के दिल में जैसे किसी ने बर्फीला पानी डाल दिया हो। उसने माहिरा की तरफ देखा, उसकी आंखों में एक सवाल था। माहिरा ने नजरें झुका लीं। "हमारा रिश्ता टूट चुका है रोहन, तुम यहाँ क्यों आए हो?" जलन की पहली लहर रोहन ने माहिरा का हाथ पकड़ने की कोशिश की। "चलो माहिरा, मॉम-डैड इंतज़ार कर रहे हैं। ये पेंटिंग-वेंटिंग छोड़ो, ये सब तुम्हारे स्टैंडर्ड का नहीं है।" आर्यन ने आगे बढ़कर रोहन का हाथ झटक दिया। हवेली के सन्नाटे में आर्यन की आवाज गूंजी। आर्यन: "उसने कहा ना, उसे नहीं जाना। और फिलहाल ये एक वर्क-साइट है, यहाँ बाहरी लोगों का आना मना है। सो, गेट आउट।" रोहन मुस्कुराया, एक चिढ़ा देने वाली मुस्कान। "आर्किटेक्ट साहब? तुम बस दीवारें बनाओ, रिश्तों में दखल मत दो।" अगले कुछ घंटों तक रोहन वहीं जमा रहा। वो आर्यन को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा था। वो माहिरा के लिए शहर का महंगा खाना लाया था, जबकि आर्यन के पास सिर्फ वो पहाड़ी कैफे की साधारण सी कॉफी थी। आर्यन ने देखा कि माहिरा परेशान थी, पर वो रोहन को सख्ती से मना नहीं कर पा रही थी। आर्यन के अंदर एक अजीब सी जलन पैदा हो रही थी—एक ऐसी जलन जिसे उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। बारिश और बंद कमरा तभी अचानक शिमला का मौसम फिर बदला। जो बारिश हल्की थी, वो अब तूफ़ान बन गई। बिजली ऐसी कड़की कि रोहन की गाड़ी का अलार्म बज उठा। रोहन घबरा गया, उसे ऐसी पहाड़ी आंधी की आदत नहीं थी। मजबूरी में तीनों को हवेली के मुख्य हॉल में रुकना पड़ा। आर्यन एक कोने में बैठकर खामोशी से अपनी फाइल देख रहा था, पर उसका पूरा ध्यान रोहन और माहिरा पर था। रोहन माहिरा को पुरानी बातें याद दिला रहा था—दिल्ली की पार्टियां, महंगे तोहफे। आर्यन (अचानक बोला): "रिश्ते तोहफों से नहीं, धागों से बनते हैं मिस्टर रोहन। और जहाँ समझदारी न हो, वहां धागे टूट ही जाते हैं।"रोहन चिढ़ गया। "तुम अपनी सलाह अपने पास रखो।" वो छोटा सा इज़हार देर रात, जब रोहन सोफे पर सो गया, माहिरा दबे पांव आर्यन के पास गई। आर्यन खिड़की के पास खड़ा बाहर के तूफ़ान को देख रहा था। माहिरा (धीमी आवाज में): "सॉरी आर्यन... मेरी वजह से तुम्हें ये सब सुनना पड़ा।"आर्यन मुड़ा। उसकी आंखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक दर्द था। "क्या तुम सच में उसके साथ वापस जाओगी?" माहिरा ने उसकी आंखों में देखा। "तुम क्या चाहते हो? क्या मैं जाऊं?"आर्यन ने एक कदम आगे बढ़ाया। उनके बीच की दूरी अब खत्म हो चुकी थी। आर्यन ने बहुत धीरे से माहिरा के कान के पास झुककर कहा, "अगर तुम गई... तो ये हवेली फिर से खंडहर बन जाएगी। और मैं... शायद मैं भी।" माहिरा की सांसें थम गईं। आर्यन ने अपना हाथ बढ़ाकर माहिरा की कलाई पर बंधा वो 'लाल धागा' छुआ। ये वो पल था जहाँ शब्द कम थे और जज्बात ज्यादा। एक नई चाल अगली सुबह, जब आर्यन जगा, तो उसने देखा कि रोहन और माहिरा दोनों गायब थे। मेज पर एक नोट पड़ा था। आर्यन ने धड़कते दिल से उसे खोला। उसमें लिखा था: "आर्यन, मुझे सच का सामना करने के लिए दिल्ली जाना होगा। मेरा इंतज़ार करना।" आर्यन का दिल बैठ गया। क्या माहिरा रोहन के पास लौट गई? या ये रोहन की कोई नई चाल थी? तभी आर्यन का फोन बजा। उसके पिता का फोन था— "आर्यन, तुरंत दिल्ली वापस आओ। तुम्हारी सगाई तय कर दी गई है।" धागे अब सिर्फ उलझे नहीं थे, बल्कि टूटने की कगार पर थे।

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