पवित्र रिश्ता : शुरुआत
स्थान : बनारस के घाट और एक आलीशान हवेली।
समय : सुबह का सूर्योदय।
सूरज की पहली किरण गंगा की लहरों पर नाच रही थी। घाटों पर शंख की आवाज और मंत्रों का उच्चारण गूंज रहा था।
भीड़-भाड़ के बीच एक युवक, जिसकी उम्र लगभग 26-27 साल थी, अपनी मां का हाथ थामे बड़ी सावधानी से सीढ़ियां उतर रहा था।
सफेद कुर्ता-पायजामा और चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव—यह आर्यन था।
"संभल के मां, यहाँ सीढ़ियां थोड़ी गीली हैं," आर्यन ने अपनी मां सुमित्रा जी का हाथ और कसकर थाम लिया।
सुमित्रा जी मुस्कुराईं, "तू साथ है तो गिरने का डर कैसा बेटा? बस दुआ है कि तुझे भी कोई ऐसी जीवनसंगिनी मिले जो तेरा हाथ इसी तरह उम्र भर थामे रहे।"
आर्यन बस हल्का सा मुस्कुरा दिया। उसके लिए उसकी दुनिया उसकी मां और उसकी छोटी सी नौकरी ही थी।
दूसरी तरफ: शहर की सबसे महंगी होटल की पार्किंग
एक चमचमाती काली मर्सिडीज आकर रुकती है। गाड़ी से एक लड़की उतरती है जिसके चेहरे पर बड़े से सनग्लासेस हैं।
स्टाइलिश वेस्टर्न ड्रेस, हाथ में आईफोन और चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास—यह सिया थी। उसके पीछे-पीछे दो बॉडीगार्ड्स और एक असिस्टेंट फाइलों का अंबार लिए चल रहे थे।
"मैम, आज की मीटिंग ओबेरॉय ग्रुप के साथ है, वो लोग प्रोजेक्ट के लिए 200 करोड़ की डिमांड कर रहे हैं," असिस्टेंट ने डरते हुए कहा।
सिया रुकी, चश्मा उतारा और उसकी आंखों में एक तीखापन था। "उन्हें कहो, सिया सिंघानिया चैरिटी नहीं करती।
बिजनेस टेबल पर इमोशन्स नहीं, नंबर्स चलते हैं। अगर उन्हें डील मंजूर नहीं, तो रास्ता खुला है।"
सिया के पिता, मिस्टर सिंघानिया, शहर के सबसे बड़े रियल एस्टेट टाइकून थे। सिया उनकी इकलौती वारिस थी, लेकिन रिश्तों और जज्बात से कोसों दूर, सिर्फ दिमाग से चलने वाली लड़की।
दोपहर का समय: नियति का टकराव
आर्यन अपनी पुरानी साइकिल से अपनी मां की दवाइयां लेकर लौट रहा था। धूप तेज थी और उसे ऑफिस पहुँचने की जल्दी थी।
वहीं दूसरी ओर, सिया अपनी कार में फोन पर चिल्ला रही थी क्योंकि उसकी एक बड़ी डील अटक गई थी।
"ड्राइवर! तेज चलाओ, हमें 10 मिनट में ऑफिस पहुँचना है!" सिया ने झुंझलाकर कहा।
ड्राइवर ने जैसे ही कार मोड़ी, सामने से साइकिल पर आर्यन आ रहा था। ड्राइवर ने अचानक ब्रेक मारा।
चर्रर्रर्र... की आवाज के साथ कार रुकी, लेकिन आर्यन की साइकिल का हैंडल कार की हेडलाइट से जा टकराया।
आर्यन नीचे गिर गया, दवाइयों का पैकेट दूर जा गिरा।सिया गुस्से में कार से बाहर निकली। "आर यू ब्लाइंड? दिख नहीं रहा इतनी बड़ी गाड़ी आ रही है?"
आर्यन खड़ा हुआ, उसने अपने घुटने की धूल झाड़ी और शांति से सिया की आंखों में देखा। "गाड़ी बड़ी होने का मतलब ये नहीं कि सड़क सिर्फ आपकी है, मैडम। मोड़ पर हॉर्न बजाना नियम होता है।"
सिया का पारा चढ़ गया। "नियम? तुम जैसे लोग मुझे नियम सिखाएंगे? मेरी एक हेडलाइट की कीमत तुम्हारी इस पूरी साइकिल और शायद तुम्हारी एक साल की सैलरी से ज्यादा होगी।"
आर्यन के चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि एक फीकी मुस्कान आई। उसने जमीन से अपनी दवाइयां उठाईं और कहा, "पैसों का घमंड अक्सर इंसान को अंधा कर देता है।
आपकी हेडलाइट ठीक हो सकती है, लेकिन अगर किसी की जान चली जाती तो आपकी दौलत उसे वापस नहीं ला पाती। अपना चश्मा उतारिए मैडम, शायद हकीकत साफ दिखे।"
इतना कहकर आर्यन अपनी साइकिल उठाकर वहां से चल दिया। सिया वहीं स्तब्ध खड़ी रह गई। आज तक किसी ने उससे इस लहजे में बात नहीं की थी। उसकी आंखों में एक अजीब सी चिढ़ और हैरानी दोनों थी।
रात का समय: एक अनजाना सा अहसास
अपने आलीशान बेडरूम में बैठी सिया बार-बार आर्यन के उन शब्दों को याद कर रही थी— "अपना चश्मा उतारिए मैडम, शायद हकीकत साफ दिखे।"
उसने अपना हाथ अपनी छाती पर रखा, उसका दिल कुछ अजीब तरह से धड़क रहा था।
वही आर्यन, अपनी मां को खाना खिलाते हुए सोच रहा था कि काश दुनिया में लोग दौलत से ज्यादा इंसानियत को अहमियत देते।
उन्हें नहीं पता था कि यह तो बस एक छोटी सी टक्कर थी। असली 'पवित्र रिश्ता' तो तब शुरू होने वाला था जब आर्यन अगले दिन उसी 'सिंघानिया ग्रुप' के ऑफिस में नौकरी का इंटरव्यू देने पहुँचने वाला था, जिसकी मालकिन सिया थी।