श्मशान का सन्नाटा
रात का समय, श्मशान घाट
घने काले बादलों ने चाँद को पूरी तरह ढक लिया है। चारों ओर सन्नाटा है, जिसे बीच-बीच में गीदड़ों के रोने की आवाज़ चीर देती है।
स्क्रीन पर धुंआ और राख उड़ती दिखती है। तभी कैमरे के सामने एक जोड़ी पैर आते हैं—धूल से सने हुए, जिनमें लोहे की बेड़ियाँ बंधी हैं।
यह अघोरानंद है। उसके गले में नरमुंडों की माला है और माथे पर राख का तिलक। वह एक अधजली चिता के सामने बैठता है और अपनी झोली से एक पुरानी, मटमैली खोपड़ी निकालता है।
अघोरानंद (गहरी और भारी आवाज़ में):
"वर्षों का इंतज़ार... बस एक कदम और। मंजरी... तू अभी सो रही है, पर तेरी नियति जाग चुकी है। तुझे मेरे पास आना ही होगा।"
वह खोपड़ी में कुछ काला चूर्ण डालता है और मंत्र बुदबुदाने लगता है। अचानक, चिता की बुझती हुई आग भड़क उठती है और उसमें से एक स्त्री की आकृति उभरती है, जो बिल्कुल मंजरी जैसी दिखती है।
मंजरी का घर, उसी रात
एक शांत और सुंदर कमरे में मंजरी सो रही है। अचानक उसे पसीना आने लगता है। वह सपने में देख रही है कि वह एक घने जंगल में भाग रही है और कोई अदृश्य साया उसका पीछा कर रहा है।
मंजरी (नींद में छटपटाते हुए): "नहीं... मुझे छोड़ दो... तुम कौन हो?"
वह अचानक हड़बड़ाकर उठ बैठती है। उसकी सांसें तेज चल रही हैं। वह पानी पीने के लिए मेज की तरफ हाथ बढ़ाती है, लेकिन जैसे ही वह गिलास छूती है, पानी अचानक बर्फ की तरह जम जाता है।
मंजरी डरकर पीछे हट जाती है। वह अपने हाथों को देखती है, जो हल्के नीले रंग की रोशनी में चमक रहे हैं।
सुबह, गांव का कुआँ
गांव की औरतें पानी भर रही हैं। मंजरी वहाँ पहुँचती है। उसकी आँखें लाल हैं, जैसे वह रात भर सोई न हो।
मंजरी की सहेली (चिंता में): "मंजरी, क्या हुआ? तू ठीक तो है? चेहरा उतरा हुआ है तेरा।"
मंजरी: "कुछ नहीं, बस रात को डरावने सपने आ रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे कोई मुझे बुला रहा है।"
तभी वहां गांव का पुजारी भागता हुआ आता है। उसका चेहरा सफेद पड़ा हुआ है।पुजारी: "अनर्थ हो गया! श्मशान के पास वाली पुरानी कुटिया में कोई आया है।
लोग कह रहे हैं कि वह कोई मामूली साधु नहीं, बल्कि काल का दूत है। उसने गांव की सीमा पर तंत्र की लकीर खींच दी है!"
मंजरी के दिल की धड़कन बढ़ जाती है। उसे महसूस होता है कि उस अनजान अघोरी और उसके सपनों के बीच कोई गहरा संबंध है।
अघोरानंद की कुटिया
अघोरानंद एक लकड़ी के खंभे पर कुछ निशान बना रहा है—ये गिनती है उन 24 बलियों की जो वह दे चुका है।
अब वह 25वां निशान बनाने के लिए रुक जाता है।अघोरानंद (मुस्कुराते हुए): "मायाजाल बिछ चुका है। शिकार खुद चलकर जाल में आएगा।"
अचानक हवा का एक तेज झोंका आता है और कुटिया का दरवाजा ज़ोर से खुलता है। सामने धूल के गुबार में एक साया खड़ा दिखता है।