अदृश्य साया
गाँव की चौपाल
गाँव के लोग डरे हुए हैं। पुजारी जी की बात सुनकर सब श्मशान की उस कुटिया की ओर देख रहे हैं जहाँ से काला धुआं उठ रहा है।
गाँव का एक बुजुर्ग: "वो कोई साधारण अघोरी नहीं है। सुना है उसके पास मरे हुए लोगों को नचाने की शक्ति है।"
मंजरी वहीं खड़ी यह सब सुन रही है।अचानक उसे महसूस होता है कि कोई उसके कान में फुसफुसा रहा है— "मंजरी... घर मत जाना... वो वहां खड़ा है।"
मंजरी पीछे मुड़कर देखती है, पर वहां कोई नहीं है। उसके हाथ का घड़ा अचानक चटक कर टूट जाता है।
मंजरी का घर - शाम
मंजरी घर पहुँचती है। घर में अजीब सी सड़न वाली गंध आ रही है। उसकी माँ रसोई में काम कर रही है, पर वह बहुत सुस्त लग रही है।
मंजरी: "माँ, ये कैसी बदबू है? और आप ठीक तो हो?"माँ धीरे से मुड़ती है, लेकिन उसकी आँखों की पुतलियाँ पूरी सफेद हैं।
वह बिना पलक झपकाए मंजरी को देखती है और अजीब, फटी हुई आवाज़ में बोलती है:
माँ: "वो आ गया है मंजरी... उसे भूख लगी है।"
मंजरी चीख मारती है और पीछे हटती है। पलक झपकते ही माँ सामान्य हो जाती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
माँ (सामान्य स्वर में): "क्या हुआ लाडो? क्यों चिल्ला रही है?"मंजरी समझ जाती है कि यह माँ नहीं, बल्कि अघोरानंद का कोई मायाजाल है।
रात का समय - अघोरानंद की कुटिया
अघोरानंद एक लकड़ी की पुतली को धागों से नचा रहा है। वह पुतली बिल्कुल मंजरी जैसी दिखती है। वह पुतली के पैर में एक कांटा चुभाता है।
उधर, अपने कमरे में लेटी मंजरी के पैर में अचानक असहनीय दर्द होता है, जैसे किसी ने सुई चुभोई हो।
वह चादर हटाकर देखती है, उसके पैर से खून निकल रहा है, जबकि वहां कोई चोट नहीं थी।
गाँव की सीमा पर - देर रात
मंजरी का दोस्त विक्रम उसे सचेत करने आता है।विक्रम: "मंजरी, ये सब सामान्य नहीं है। मैंने उस अघोरी को देखा है, वो आधी रात को तुम्हारी तस्वीर पर राख छिड़क रहा था।
हमें शहर जाकर पुलिस को बताना होगा।"
मंजरी (डरते हुए): "पुलिस कुछ नहीं कर पाएगी विक्रम। ये खेल रूहों का है।"
तभी अचानक आसमान से काली बारिश होने लगती है—पानी नहीं, बल्कि काली राख बरस रही है। पूरे गाँव में शोर मच जाता है। लोग अपने घरों से बाहर निकलते हैं।
श्मशान का रास्ता
मंजरी अपने आप को रोक नहीं पाती। जैसे कोई सम्मोहन (Hypnotism) उसे खींच रहा हो, वह पागलों की तरह श्मशान की ओर भागने लगती है।
विक्रम उसे रोकने की कोशिश करता है, पर एक अदृश्य दीवार उसे पीछे धकेल देती है।
मंजरी अघोरानंद की कुटिया के सामने पहुँचती है।
अघोरानंद आग के सामने बैठा है, उसकी आँखें अंगारे की तरह दहक रही हैं।
अघोरानंद (ठहाका मारते हुए): "स्वागत है यक्षिणी की पोती!
तेरा खून ही मुझे अमर बनाएगा। आज से तेरा शरीर मेरा है और तेरी आत्मा मेरी दासी!"
मंजरी घुटनों के बल गिर जाती है और उसकी आँखों से आंसू निकलने लगते हैं।
लेकिन तभी उसकी आँखों का रंग हल्का नीला होने लगता है—उसकी सोई हुई शक्ति पहली बार जाग रही है।