नीली ज्वाला का उदय
अघोरानंद की कुटिया - रात का समय
मंजरी घुटनों के बल बैठी है, उसकी आँखों से आंसू गिर रहे हैं, लेकिन उन आंसुओं का रंग भी चांदी जैसा चमक रहा है। अघोरानंद अपनी जगह से खड़ा होता है, उसके हाथ में एक इंसानी हड्डी से बना खंजर है।
अघोरानंद (हैरानी और लालच के साथ): "यह चमक... यह साधारण इंसानी डर नहीं है। तेरे खून में यक्षिणी का अंश जाग रहा है! जितना दिव्य तेरा रक्त होगा, उतनी ही अमर मेरी शक्ति होगी!"
वह खंजर हवा में लहराता है और मंजरी की ओर बढ़ता है। अचानक, कुटिया की सारी मशालें एक साथ बुझ जाती हैं और केवल मंजरी की आँखों की नीली रोशनी अंधेरे को चीरती है।
श्मशान के बाहर - विक्रम की छटपटाहट
विक्रम उस अदृश्य दीवार को लात-घूंसे मार रहा है जो उसे कुटिया की तरफ जाने से रोक रही है।विक्रम (चिल्लाते हुए): "मंजरी! बाहर आओ!
भागो वहां से!"तभी उसे जमीन पर एक चमकती हुई पुरानी अंगूठी दिखती है, जो मंजरी के भागते समय गिर गई थी।
जैसे ही विक्रम उसे उठाता है, उसे एक झटका लगता है और वह अदृश्य दीवार कांच की तरह टूट जाती है। वह अंदर की ओर भागता है।
कुटिया के अंदर - तांत्रिक युद्ध
अघोरानंद मंत्र पढ़ते हुए मंजरी पर काली राख फेंकता है। राख हवा में ही जम जाती है और छोटे-छोटे काले बिच्छुओं में बदल जाती है।
जो मंजरी की ओर रेंगने लगते हैं।मंजरी (कांपती हुई आवाज़ में): "दूर रहो... मुझसे दूर रहो!"
जैसे ही वह अपना हाथ आगे बढ़ाती है, उसके हाथों से एक नीली अग्नि (Blue Fire) निकलती है। वह आग उन बिच्छुओं को पल भर में भस्म कर देती है।
अघोरानंद पीछे हटता है, उसके चेहरे पर अब डर और उत्साह दोनों हैं।अघोरानंद: "तू खुद नहीं जानती तू क्या है, लड़की! तू तो साक्षात सिद्धियों की खान है।"
वह अपना कमंडल जमीन पर पटकता है। जमीन फटती है और उसमें से चार प्रेत (साये) निकलते हैं जो मंजरी को चारों तरफ से घेर लेते हैं।
रहस्यमयी बचाव
मंजरी की शक्ति अभी भी अस्थिर है। प्रेत उसे छूने ही वाले होते हैं कि तभी विक्रम कुटिया के दरवाजे पर पहुँचता है। उसके हाथ में वह पुरानी अंगूठी है।
विक्रम: "मंजरी, ये पकड़ो!"
वह अंगूठी मंजरी की तरफ फेंकता है। जैसे ही मंजरी उसे हवा में पकड़ती है, एक ज़ोरदार धमाका होता है। पूरी कुटिया हिलने लगती है।
अघोरानंद की आँखों में खून उतर आता है। वह मंत्र पढ़ता है जिससे पूरी कुटिया धुएं से भर जाती है।
जब धुआं छंटता है, मंजरी और विक्रम वहां नहीं होते। अघोरानंद अकेला खड़ा जोर-जोर से हंसने लगता है।
अघोरानंद: "भाग ले... जहाँ तक भागना है भाग ले।
उस अंगूठी ने तुझे बचा तो लिया, पर अब तूने 'मायाजाल' की दूसरी परत को सक्रिय कर दिया है। अब तू जहाँ भी जाएगी, मौत तेरे पीछे चलेगी।"
गाँव का पुराना मंदिर - भोर का समय
मंजरी और विक्रम हाफते हुए मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे हैं। मंजरी के हाथ में वह अंगूठी अब काली पड़ चुकी है।
मंजरी (सहमी हुई): "विक्रम, उसने कहा कि मैं यक्षिणी की वंशज हूँ। ये सब क्या है? माँ-बाबूजी को कुछ हो गया तो?"
अचानक मंदिर का घंटा अपने आप बजने लगता है, जबकि वहां कोई नहीं है। हवा में एक सन्देश गूँजता है— "मंजरी, घर मत जाना... घर अब घर नहीं रहा।"