साजिश का साया और आधी रात का मिशन
अगली सुबह ज़ोया जब ऑफिस पहुँची, तो माहौल कुछ बदला-बदला सा था।
आर्यन अपने केबिन में किसी से गुपचुप बात कर रहा था, और उसकी नज़रों में एक अजीब सी विजयी चमक थी।
कबीर हमेशा की तरह अपनी डेस्क पर फाइलों के ढेर में डूबा था, लेकिन उसकी आँखों में सतर्कता थी।
"ज़ोया, केबिन में आओ," कबीर ने उसे धीरे से इशारा किया।
जैसे ही ज़ोया केबिन में गई, कबीर ने दरवाज़ा लॉक कर दिया। उसने मेज़ पर कुछ तस्वीरें फेंकीं—ये वही तस्वीरें थीं जो कल रात खींची गई थीं, जिनमें कबीर और ज़ोया सड़क पर बात कर रहे थे।
"कोई हमारा पीछा कर रहा है," कबीर की आवाज़ में बर्फ जैसी ठंडक थी। "आर्यन को मुझ पर शक होने लगा है।
उसे लगता है कि 'असिस्टेंट कबीर' के पास कुछ ऐसी जानकारी है जो उसे बर्बाद कर सकती है।"
"तो आप उसे सच क्यों नहीं बता देते?" ज़ोया ने घबराते हुए पूछा।
"अभी नहीं। अगर उसे पता चला कि मैं ही असली कबीर हूँ, तो वह उन सबूतों को मिटा देगा जो उसने कंपनी के पैसों की हेराफेरी के लिए छिपा रखे हैं।
हमें आज रात उस स्कूल के पुराने स्टोर रूम में जाना होगा।"
"स्कूल? आधी रात को?" ज़ोया की आँखें फैल गईं।
"हाँ। स्कूल की ज़मीन के असली कागज़ात वहीं एक लॉकर में छिपे हैं।
आर्यन उन्हें ढूंढ नहीं पाया क्योंकि उसे लगता है कि वो मेरे पास हैं। अगर हमें वो मिल गए, तो हम स्कूल भी बचा लेंगे और आर्यन का खेल भी खत्म कर देंगे।"
रात के 12 बजे थे। चारों तरफ सन्नाटा था। ज़ोया और कबीर स्कूल की पिछली दीवार फांदकर अंदर घुसे। ज़ोया टॉर्च की रोशनी में रास्ता देख रही थी, जबकि कबीर की चाल एक सधे हुए जासूस जैसी थी।
जैसे ही वे पुराने स्टोर रूम में पहुँचे, ज़ोया का पैर एक पुरानी लकड़ी की तख्ती पर पड़ा और ज़ोर की आवाज़ हुई।
कड़क!
"शशश..." कबीर ने फुसफुसाते हुए ज़ोया को अपनी ओर खींचा और उसका मुँह अपने हाथ से बंद कर दिया। दोनों एक पुरानी अलमारी के पीछे छिप गए।
बाहर किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी। भारी जूतों की आवाज़—आर्यन के आदमी वहाँ पहुँच चुके थे।
"ढूंढो उसे! साला असिस्टेंट यहीं कहीं छुपा होगा," एक कर्कश आवाज़ आई।
अंधेरे में ज़ोया का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा गुंडे सुन लेंगे। कबीर उसे थामे हुए था।
इस घोर संकट के बीच भी, ज़ोया को कबीर की बाहों में एक अजीब सा सुकून और सुरक्षा महसूस हो रही थी। कबीर ने उसकी आँखों में देखा और उसे शांत रहने का इशारा किया।
गुंडे पास से गुजर गए। कबीर ने फुर्ती से दीवार के एक गुप्त हिस्से को धक्का दिया। वहां एक छोटा सा लोहे का बॉक्स था।
उसने उसे निकाला और ज़ोया का हाथ पकड़कर पिछले रास्ते से भाग निकला।
गाड़ी में बैठने के बाद ज़ोया ने राहत की साँस ली। "हमें मिल गए?"
कबीर ने बॉक्स खोला। उसमें सिर्फ कागज़ात नहीं थे, बल्कि एक पुरानी वसीयत भी थी। जैसे ही कबीर ने वसीयत पढ़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"क्या हुआ कबीर?" ज़ोया ने उसका हाथ पकड़ा।
कबीर ने कांपती आवाज़ में कहा, "यह स्कूल सिर्फ एक स्कूल नहीं है ज़ोया... यह मेरी माँ का सपना था।
और इसमें लिखा है कि अगर यह स्कूल कभी टूटा, तो 'रायचौधरी कॉर्पोरेशन' का सारा मालिकाना हक अपने आप एक ट्रस्ट के पास चला जाएगा।
आर्यन को यह बात पता है, इसीलिए वह इसे तुड़वाकर मुझे सड़क पर लाना चाहता है।"
तभी अचानक एक तेज़ रोशनी उनकी गाड़ी पर पड़ी। पीछे से आर्यन की काली गाड़ी उनकी कार को टक्कर मारने की कोशिश कर रही थी।
"पकड़े रहो!" कबीर ने चिल्लाते हुए एक्सीलेटर पर पैर रख दिया। बिलेनियर की पहचान अब दांव पर थी, और उसकी ज़िंदगी भी।