खामोश रक्षक और धड़कता दिल
गुंडे कबीर की आँखों में वो खौफनाक चमक देखकर पसीने-पसीने हो गए। बिना एक शब्द बोले, वे वहाँ से ऐसे भागे जैसे उन्होंने साक्षात मौत देख ली हो।
ऑफिस के बाहर खड़े लोग हैरान थे कि एक मामूली से 'असिस्टेंट' ने उन नामी गुंडों को कैसे भगा दिया।
ज़ोया की साँसें तेज़ चल रही थीं।
उसने कबीर की तरफ देखा, जो अब वापस अपनी शर्ट की आस्तीन नीचे कर रहा था और चेहरे पर वही सादगी ओढ़ चुका था।
"तुम... तुम ठीक हो?" कबीर ने धीमी आवाज़ में पूछा।
"हाँ, पर आपने उन्हें क्या कहा? वो इतनी जल्दी क्यों मान गए?" ज़ोया ने शक की निगाह से पूछा।
कबीर ने बात घुमा दी, "मैंने बस पुलिस की धमकी दी। चलो, अंदर चलो, आर्यन सर आते ही होंगे।"
पूरे दिन ऑफिस में ज़ोया का मन काम में नहीं लगा। वह बार-बार कबीर को देख रही थी जो अपनी डेस्क पर बैठकर बोरियत भरी फाइलें चेक करने का नाटक कर रहा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक आदमी इतना बड़ा दोहरा व्यक्तित्व (Double Life) कैसे जी सकता है।
तभी आर्यन के केबिन से चिल्लाने की आवाज़ आई।
"ये क्या बदतमीज़ी है? ये फाइलें किसने बदलीं?"
आर्यन बाहर निकला, उसके हाथ में वही कागजात थे जो कबीर ने ज़ोया को ईमेल किए थे। वह सीधा ज़ोया की डेस्क की तरफ बढ़ा।
"ज़ोया! ये तुम्हारी हरकत है न? तुमने मेरे पर्सनल प्रोजेक्ट की फाइलें लीक की हैं?" आर्यन ने मेज पर हाथ पटकते हुए कहा।
ज़ोया घबरा गई, "सर, मैंने कुछ नहीं किया..."
"झूठ मत बोलो! कल तुमने ही स्कूल को लेकर नाटक किया था।" आर्यन ने हाथ उठाया ही था कि तभी पूरे ऑफिस के स्पीकर्स में एक भारी और गूँजती हुई आवाज़ आई।
यह आवाज़ कबीर की थी, लेकिन वह अपनी डेस्क पर शांत बैठा था। उसने पहले से रिकॉर्ड की हुई अपनी 'बॉस' वाली आवाज़ प्ले कर दी थी।
"आर्यन, अपनी सीमा में रहो। ज़ोया इस प्रोजेक्ट की हेड है, और उसे सवाल पूछने का पूरा हक़ है।"आर्यन ठिठक गया।
उसे लगा कि कबीर रायचौधरी ऊपर अपने केबिन से कैमरों के जरिए सब देख रहा है। "सॉरी भाई... मेरा मतलब है, सॉरी सर।" आर्यन बुदबुदाया और अपने केबिन में दुबक गया।
शाम को जब ऑफिस खाली हो गया, ज़ोया कबीर के पास गई। कबीर अपनी पुरानी साइकिल के पास खड़ा था (जो उसने अपनी पहचान छुपाने के लिए रखी थी)।
"थैंक यू," ज़ोया ने धीरे से कहा। "आज आपने मुझे दो बार बचाया।"
कबीर मुस्कुराया। "मैंने कुछ नहीं किया ज़ोया, वो तो 'बॉस' की आवाज़ थी।"
"झूठ बोलना बंद कीजिए कबीर," ज़ोया उसके करीब आई। "आप जितने कठोर बनने का नाटक करते हैं, अंदर से उतने ही... अलग हैं।
आप अपनी पहचान छुपाकर क्यों जी रहे हैं? क्या आप किसी से डरते हैं?"कबीर की मुस्कान गायब हो गई। उसने साइकिल पकड़ी और सड़क की तरफ देखते हुए बोला, "डरता नहीं हूँ ज़ोया, बस नफरत करता हूँ ।
उस दुनिया से जहाँ लोग इंसान को नहीं, उसके बैंक बैलेंस को देखते हैं। इस चश्मे और इस साधारण शर्ट के पीछे मैं कम से कम 'मैं' तो रह पाता हूँ।"
ज़ोया को पहली बार कबीर के अकेलेपन का अहसास हुआ। उसे लगा कि करोड़ों की दौलत के बीच भी यह इंसान कितना तन्हा है।
"कल सुबह जल्दी आना," कबीर ने जाते-जाते कहा। "हमें उस स्कूल के बच्चों के लिए कुछ करना है, 'बॉस' का यही हुक्म है।"
जैसे ही कबीर अंधेरे में ओझल हुआ, ज़ोया वहीं खड़ी उसे देखती रही। उसे अहसास ही नहीं हुआ कि कब उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई थी।
लेकिन उसे नहीं पता था कि दूर खड़ी एक काली गाड़ी से कोई उनकी तस्वीरें खींच रहा था। कबीर का राज़ अब खतरे में था।