रहस्यमयी बुलावा
दिसंबर की वह शाम सामान्य से कहीं ज़्यादा ठंडी थी। वकील विक्रम खन्ना अपने पुराने दफ़्तर में बैठकर फाइलों के ढेर में उलझे हुए थे, तभी उनकी मेज़ पर एक लिफाफा आकर गिरा।
लिफाफा पीला पड़ चुका था, जैसे बरसों पुराना हो, लेकिन उस पर लगी मुहर बिल्कुल ताज़ा थी—ठाकुर गजेंद्र सिंह की पुश्तैनी मुहर।
विक्रम के हाथ कांपने लगे। "यह कैसे संभव है? ठाकुर साहब को मरे हुए तो एक साल बीत चुका है," उन्होंने बुदबुदाते हुए लिफाफा खोला।
अंदर एक वसीयतनामा था और तीन चिट्ठियाँ। निर्देश साफ़ थे: ठाकुर के तीन सबसे करीबी रिश्तेदारों को तुरंत 'रूहानी विला' बुलाया जाए।
अगर वे नहीं आए, तो करोड़ों की जायदाद सरकार के नाम कर दी जाएगी।अगले ही दिन, शहर के अलग-अलग कोनों से तीन गाड़ियाँ उस वीरान हवेली की ओर बढ़ीं।
सुमित :
जो जुए में अपना सब कुछ हार चुका था और उसे इस वसीयत से अपनी जान बचाने की उम्मीद थी।
माया :
एक ढलती हुई अभिनेत्री, जिसकी चमक खो चुकी थी और उसे अब सिर्फ पैसे का सहारा चाहिए था।
समीर :
एक शांत, चश्मा पहनने वाला लेखक, जिसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी।
जैसे ही तीनों हवेली के बड़े लोहे के गेट पर पहुँचे, वह अपने आप चरमराते हुए खुल गया।
सामने खड़ी थी 'रूहानी विला'—धुंध में लिपटी हुई, काली और खामोश।
खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे, जो किसी डरावनी आँखों की तरह उन्हें देख रहे थे।
तभी बरामदे में एक लालटेन की रोशनी दिखाई दी। एक बूढ़ा आदमी, जिसकी कमर झुकी हुई थी, धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ा।
वह रहमत काका थे, जो सालों से इस हवेली की देखभाल कर रहे थे।
उसने बिना ऊपर देखे, एक ठंडी आवाज़ में कहा, "साहब इंतज़ार कर रहे हैं... पर याद रहे, यहाँ से बाहर जाने का रास्ता सिर्फ वसीयत के पन्नों से होकर गुज़रता है।"
सुमित ने हंसने की कोशिश की, "कौन सा साहब? ठाकुर तो मर चुके हैं!"
रहमत काका ने अपनी सफ़ेद आँखों से सुमित को देखा और कहा, "मुर्दे मरते कहाँ हैं साहब, वो तो बस वसीयत लिखते हैं।"
हवेली के अंदर कदम रखते ही एक ज़ोरदार धमाके के साथ मुख्य दरवाज़ा बंद हो गया। खेल शुरू हो चुका था।