मुर्दों की वसीयत
हवेली की दहलीज पर
📤 🌓
अध्याय 2

हवेली की दहलीज पर

जैसे ही भारी सागवान का दरवाजा एक जोरदार धमाके के साथ बंद हुआ, अंदर का सन्नाटा और भी गहरा हो गया। हवेली की हवा में एक अजीब सी गंध थी—पुरानी किताबों, सीलन और बुझती हुई मोमबत्तियों की मिली-जुली महक। "ये क्या मजाक है? दरवाजा खोलो!" सुमित चिल्लाया और उसने कुंडी को जोर-जोर से हिलाया, लेकिन दरवाजा टस से मस न हुआ। माया ने अपने रेशमी दुपट्टे को कसकर लपेटा और कांपती आवाज में कहा, "विक्रम जी, आप वकील हैं, कुछ कीजिए। हमें यहाँ कैद नहीं किया जा सकता!" वकील विक्रम खन्ना ने अपनी ऐनक साफ की और शांत स्वर में बोले, "शात हो जाइए। वसीयत की शर्तों के मुताबिक। एक बार अंदर कदम रखने के बाद सूरज ढलने से पहले कोई बाहर नहीं जा सकता। और अब... सूरज ढल चुका है।" रहमत काका एक पुरानी पीतल की मशाल लेकर गलियारे की ओर बढ़े। "ऊपर के कमरे तैयार हैं। आप लोग थक गए होंगे। खाना मेज पर लगा दिया गया है।"वे तीनों भारी मन से डाइनिंग हॉल की ओर बढ़े। वहाँ एक विशाल मेज सजी थी। चाँदी के बर्तनों में खाना परोसा गया था। लेकिन मेज के मुख्य हिस्से पर एक खाली कुर्सी रखी थी। उस कुर्सी पर ठाकुर गजेंद्र सिंह का पुराना चश्मा और उनकी बेंत (छड़ी) रखी थी। "अरे, ये तो वही चश्मा है जो ठाकुर साहब पहनते थे," समीर ने करीब जाकर देखा। उसकी लेखक वाली आँखों ने गौर किया कि चश्मे पर धूल की एक बूंद भी नहीं थी, जैसे उसे अभी-अभी किसी ने वहाँ रखा हो। खाना खाते समय कोई कुछ नहीं बोला। अचानक, ऊपर की मंजिल से किसी के भारी कदमों की आवाज आई। धप... धप... धप... जैसे कोई भारी बूट पहनकर टहल रहा हो। "ऊपर कौन है?" सुमित ने अपनी जेब से एक छोटा चाकू निकालते हुए पूछा। रहमत काका ने बिना पलक झपकाए जवाब दिया, "ऊपर कोई नहीं रहता साहब। सिवाय यादों के। और शायद... उन वादों के जो ठाकुर साहब ने अपनी मौत से पहले किए थे।" तभी, पूरे हॉल की बत्तियाँ एक साथ बुझ गईं। घुप अंधेरा छा गया। माया की एक चीख गूँजी। जब कुछ सेकंड बाद विक्रम ने माचिस जलाई, तो सब सन्न रह गए। मेज के बीचों-बीच रखी ठाकुर साहब की बेंत गायब थी, और उसकी जगह एक छोटा सा कागज का टुकड़ा पड़ा था। उस पर खून जैसी लाल स्याही से लिखा था: "मेरे घर में मेहमान बनकर आए हो, तो मेरे नियमों का पालन करो। यहाँ से वही जाएगा, जिसका दिल साफ होगा... या जिसकी रूह खाली होगी।" समीर ने कांपते हाथों से कागज पकड़ा और बोला, "यह वसीयत नहीं है... यह तो मौत का बुलावा लग रहा है।" रात अभी शुरू हुई थी, और 'रूहानी विला' की दीवारें अब फुसफुसाने लगी थीं।

💬 बातचीत (Comments)
⏮️ पिछला 📖 सूची समाप्त 🎉