देहरादून की वह बारिश
देहरादून की बारिश आम तौर पर सुकून देती है, लेकिन उस शाम बादलों का रंग स्याह था—जैसे आसमान पर किसी ने राख और खून का मिश्रण छिड़क दिया हो।
राजपुर रोड के किनारे स्थित 'स्टेट आर्काइव्स' की इमारत किसी पुरानी कब्र की तरह शांत थी।
अद्वैत पिछले आठ घंटों से उस धूल भरी काल कोठरी जैसे रिकॉर्ड रूम में बैठा था। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे, जो उसके जुनून की गवाही दे रहे थे।
वह एक 'आर्काइविस्ट' था, जिसे मरी हुई कहानियों को जिंदा करने का शौक था। तभी उसकी नज़र एक ऐसी शेल्फ पर पड़ी, जो सालों से जालों के पीछे छिपी थी।
उसने एक पीली पड़ चुकी फाइल निकाली। उस पर चांदी के अक्षरों में धुंधला सा लिखा था:
"The Lamplough Diaries - 1940"
"मसूरी की पहाड़ियों की जड़ें सिर्फ मिट्टी में नहीं, बल्कि उन रूहों में दबी हैं जिन्होंने इस कोठी को अपना खून दिया।
अगर आप इसे पढ़ रहे हैं, तो मुड़ जाइए। यहाँ समय ठहर गया है।"
अद्वैत के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। तभी उसके फोन की वाइब्रेशन ने सन्नाटा तोड़ दिया। सना का कॉल था।
"अद्वैत! मुझे वह पुराना मैप मिल गया है। 1940 के बाद से वह इलाका 'नो-गो ज़ोन' घोषित कर दिया गया था।
तन्मय अपनी थार लेकर बाहर खड़ा है। क्या तुम तैयार हो?"अद्वैत ने भारी मन से फाइल उठाई और बाहर की ओर बढ़ा। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
थार के अंदर तन्मय तेज़ म्यूजिक सुन रहा था—अपनी घबराहट छिपाने के लिए।
"क्या मिला?" तन्मय ने पूछा
अद्वैत ने फाइल खोली और वह नक्शा दिखाया जो फाइल से चिपका हुआ था।
नक्शे के अंत में एक नोट था: "पहाड़ की नींव हड्डियों पर है, ताकि यह कभी न गिरे।"
सना ने कैमरा ऑन किया और रिकॉर्डिंग शुरू की, "आज हम उस राज की तलाश में निकल रहे हैं।
जिसे देहरादून और मसूरी ने 80 सालों से अपने सीने में दबा रखा है। लैम्पलॉघ एस्टेट।"
गाड़ी के पहिए कीचड़ को चीरते हुए मसूरी की ओर मुड़े, और ठीक उसी पल देहरादून की सारी स्ट्रीट लाइट्स एक साथ बुझ गईं।
जैसे शहर उन्हें रुकने का आखिरी इशारा कर रहा हो।