किंक्रेग का मोड़
मसूरी की मुख्य सड़क से हटकर एक पुराना रास्ता 'किंक्रेग' (Kinkraig) के पास से नीचे की ओर कटता है।
तन्मय ने जैसे ही गाड़ी उस मोड़ पर मोड़ी, थार के डैशबोर्ड पर लगा डिजिटल क्लॉक 00:00 पर अटक गया।
"ये क्या बदतमीज़ी है? अभी तो 11:45 हो रहे थे," तन्मय ने घड़ी को थपथपाते हुए कहा।
अचानक, गाड़ी का रेडियो अपने आप चालू हो गया। पहले तेज शोर (Static) सुनाई दिया, और फिर एक भारी, फटी हुई आवाज़ गूँजी— "रुको... मत आओ... रुको..."
"अद्वैत, ये रेडियो स्टेशन कौन सा है?" सना ने डरते हुए पूछा। अद्वैत ने देखा कि रेडियो की सुई उस फ्रीक्वेंसी पर थी जो सालों पहले बंद हो चुकी थी।
तभी, हेडलाइट की रोशनी में सड़क के ठीक बीचों-बीच एक धुंधली आकृति खड़ी दिखी। वह एक छोटा बच्चा था, जिसने पुराने जमाने का 'गटरू' (पहाड़ी कोट) पहना था।
उसका चेहरा नीचे की ओर झुका था।"तन्मय, ब्रेक!" अद्वैत चिल्लाया।
टायर सड़क पर घिसटते हुए चीख उठे। गाड़ी उस आकृति से महज एक इंच की दूरी पर रुकी। तीनों के दिल धड़क रहे थे।
वे दो मिनट तक सुन्न बैठे रहे। जब तन्मय ने हिम्मत जुटाकर दरवाज़ा खोला और बाहर टॉर्च जलाई, तो वहाँ कोई नहीं था।
"कहाँ गया वो?" सना ने बाहर झाँकते हुए पूछा।
नीचे कीचड़ वाली ज़मीन पर छोटे पैरों के निशान बने थे।
लेकिन अजीब बात यह थी कि वे निशान गाड़ी की तरफ नहीं आ रहे थे, बल्कि गाड़ी से दूर जंगल की ओर जा रहे थे।
और उससे भी डरावनी बात—वे निशान केवल दो कदम चले थे और फिर अचानक खत्म हो गए, जैसे वह बच्चा वहीं से हवा में उड़ गया हो।