कोहरे का कफ़न : द लैम्पलॉघ डायरीज
बिशु दा का रहस्य
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अध्याय 3

बिशु दा का रहस्य

"कौन है वहाँ?" तन्मय की आवाज़ में घबराहट साफ़ थी, भले ही वह उसे एड्रेनालिन का नाम दे रहा था। कोहरे की मोटी चादर को चीरते हुए एक पुरानी लालटेन की पीली रोशनी करीब आई। एक बूढ़ा, झुका हुआ शरीर अंधेरे से बाहर निकला। उसने एक मैला सा ओवरकोट पहना था और उसके हाथ में एक टेढ़ी-मेढ़ी लकड़ी थी। यह बिशु दा थे—वही गाइड जिसके बारे में अद्वैत ने पुरानी फाइलों में पढ़ा था, लेकिन फाइलें तो 40 साल पुरानी थीं। बिशु दा वैसे ही दिख रहे थे जैसा आर्काइव की एक धुंधली तस्वीर में थे। "साहब, इस मोड़ पर रुकना मौत को दावत देना है," उनकी आवाज़ सूखी पत्तियों के आपस में रगड़ने जैसी थी। "बिशु दा? आप इस वक्त यहाँ क्या कर रहे हैं?" अद्वैत ने अपनी टॉर्च उनकी ओर घुमाई। बिशु दा ने अपनी आँखें सिकोड़ीं। उनकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं, जैसे उन पर सफेदी पुत दी गई हो। "मैं तो यहीं रहता हूँ साहब, सदियों से। आप लोग जिस 'लैम्पलॉघ' की तलाश में हैं, वह अब कोई जगह नहीं रही। वह एक भूखा एहसास बन चुकी है।" सना ने अपना कैमरा उनकी ओर किया, "दा, आप हमें डरा रहे हैं। हमें बस उस एस्टेट का रास्ता बता दीजिए।" बिशु दा एक खौफनाक हंसी हंसे। "रास्ता? रास्ता तो वह खुद बनाता है। लेकिन मेरी एक बात याद रखना—आज की रात 'धुंध का पहरा' है। जो ऊपर जाता है, वह अपनी परछाईं वहीं छोड़ आता है। बिना परछाईं का शरीर रूह के लिए जेल बन जाता है।" अचानक, बिशु दा ने अद्वैत का हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ बर्फ जैसी ठंडी थी। उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, "तुम्हारी फाइल में वह 'सील' (सुरक्षा मंत्र) तो है, पर क्या तुम्हारे पास उसे पढ़ने का साहस है? क्योंकि लैम्पलॉघ को नए मेहमान पसंद हैं, और पुराने पहरेदारों को... आज़ादी।" इससे पहले कि अद्वैत कुछ पूछ पाता, तन्मय ने उसे पीछे खींचा। "छोड़ो यार अद्वैत, ये बूढ़ा बस हमें डराकर पैसे ऐंठना चाहता है। चलो यहाँ से।" वे तीनों गाड़ी में बैठ गए और जैसे ही तन्मय ने एक्सीलेटर दबाया, अद्वैत ने पीछे मुड़कर देखा। बिशु दा वहीं खड़े थे। लेकिन अजीब बात यह थी कि उनकी लालटेन की रोशनी में उनकी कोई परछाईं नहीं बन रही थी। वे बस धुंध में घुलते जा रहे थे।

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