हरिद्वारी का भूत, समोसे और बाज़ार का छल
रुद्रप्रयाग का वह पुराना बाज़ार आज की तरह कंक्रीट का बेतरतीब जंगल नहीं हुआ करता था।
अलकनंदा और मंदाकिनी के संगम पर बसे इस कस्बे में तब गिने-चुने लालाओं की दुकानें थीं, कुछ सरकारी दफ्तर थे और पहाड़ की वह सादगी थी।
जिसमें खबरों से ज़्यादा अफ़वाहें और किस्से सफर किया करते थे। और इन्हीं किस्सों का एक जीता-जागता, खौलता हुआ किरदार था—हरिद्वारी हलवाई।
हरिद्वारी और उसकी 'हाम' के दिन
हरिद्वारी महज़ एक नाम नहीं, बल्कि रुद्रप्रयाग के चटोरेपन का सबसे बड़ा ब्रांड था। उसकी दुकान के आगे से गुज़रना किसी तपस्या से कम नहीं था।
कड़ाही में छनते खस्ते समोसे, तेल में तैरती सुनहरी चाट-पकौड़ी और छोलों से उठने वाली वह गाढ़ी, मसालेदार भाप किसी भी राहगीर के कदम वहीं जड़ देने के लिए काफी थी।
उसकी बनाई उस खट्टी-मीठी चटनी में धनिए की तीखी ख़ुशबू के साथ लहसुन और हरी मिर्च की ऐसी अचूक तासीर होती थी।
कि जो एक बार खा ले, वह उम्र भर के लिए हरिद्वारी का गुलाम हो जाए।
हरिद्वारी नितांत अविवाहित था। न आगे नाथ, न पीछे पगहा। शायद इसीलिए उसकी ज़िंदगी के अपने अलग उसूल थे।
इलाके में सब जानते थे कि हरिद्वारी 'कच्ची' (देसी शराब) का पक्का और पुराना शौक़ीन है।
जब उसकी कारीगरी पर लोगों की वाह-वाही का सुरूर चढ़ता, तो वह एक अजीब सी 'हाम' (पहाड़ी ठसक या अहंकार) में आ जाता था।
हाम के उन दिनों में वह ग्राहकों को ऐसे समोसे पकड़ाता, मानो कोई चक्रवर्ती सम्राट अपनी प्रजा को खैरात बांट रहा हो।
लाला लोग उसकी झिड़कियों को भी प्रसाद मानकर सह लेते थे, क्योंकि वे जानते थे कि पूरे गढ़वाल में इस जादुई स्वाद का कोई दूसरा सानी नहीं है।
लेकिन कहते हैं न, इंसान का गुरूर ही उसे ज़मीन पर लाता है। जिन दिनों हरिद्वारी की हाम अपने चरम पर थी।
उन्हीं दिनों एक मनहूस शाम वह 'कच्ची' के गहरे प्रभाव में एक ऊंची छत पर टहल रहा था। पैर फिसला, वह औंधे मुंह नीचे आ गिरा।
बुरी तरह चोटिल हुआ और भोर होने से पहले ही हमेशा के लिए चल बसा।
बाज़ार का मातम और वह सर्द रात
हरिद्वारी के जाने से रुद्रप्रयाग के चटोरे मानों अनाथ हो गए।
हफ़्तों तक लोग उसकी बंद दुकान के शटर को देखकर ठंडी आहें भरते और मर्सिया गाते रहे। शामें सूनी हो गईं।
ऐसा लगने लगा जैसे बाज़ार से नमक ही गायब हो गया हो।
फिर एक रात वह हुआ जिसने रुद्रमहादेव की इस धरती पर तहलका मचा दिया।
सर्दियों की रात थी। रुद्रा टॉकीज़ में राज कपूर की "संगम" का 9 से 12 वाला नाईट शो छूट चुका था। धुंध इतनी कि हाथ को हाथ न सुझे।
कुछ रसिकमिज़ाज़ लोग, जो "देसी" के प्रभाव में दुनिया के सारे गम भुलाकर झूमते-गाते घर लौट रहे थे।
उन्होंने हरिद्वारी की बंद दुकान के पास जो नज़ारा देखा, उससे उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
हरिद्वारी की दुकान के ठीक बगल में, उसी मनहूस जगह पर सड़क किनारे कोई एक ठेली लगाए खड़ा था!
ठेली पर टिमटिमाती लालटेन की रोशनी में एक साया कड़ाही में झर्ना चला रहा था।
उस सर्द, सुन्न कर देने वाली रात में यह सीन इतना डरावना था कि 'देसी' तो क्या, 'सिग्नेचर' या 'ब्लैक डॉग' का जादू भी चुटकियों में भाप बन उड़ने के लिए काफी था।
डर के मारे रसिकों के हलक सूख गए और वे जिस रफ़्तार से 'भूत-भूत' चिल्लाते हुए उल्टे पांव भागे, वह किसी ओलंपिक धावक को भी शर्मिंदा कर दे।
पुलिस चौकी का ज्ञान और तांत्रिक की तलाश
अगली सुबह सूरज उगने से पहले ही हरिद्वारी के भूत की चर्चा पूरे बाज़ार में दावानल की तरह फैल गई।
कुछ लोगों ने कसम खाकर कहा कि उन्होंने पहले भी अंधेरी रातों में हरिद्वारी की आत्मा की बेचैनी महसूस की थी।
लेकिन वह भूत बकायदा ठेली लेकर सड़क पर आ धमकेगा—यह कल्पना तो किसी ने सपने में भी नहीं की थी।
बाज़ार में दहशत का यह आलम था कि सूरज ढलते ही लोग किवाड़ पर दो-दो कुंदियां चढ़ाने लगे।
आखिरकार कुछ नेता-टाइप महानुभाव, जो समाज सुधार का ठेका लिए रहते थे, सुबह-सुबह पुलिस चौकी रपट लिखवाने पहुँच गए।
चौकी इंचार्ज भी अपने किस्म के भारी ज्ञानी थे। उन्होंने टेबल पर रखी कानूून की मोटी किताब पर हाथ मारते हुए।
आईपीसी (IPC) की विभिन्न धाराओं का विस्तार से हवाला दिया और समझाया— "देखिए नेताजी, पुलिस को चोर-उचक्कों।
जेबकतरों और बदमाशों से निपटने का अधिकार तो संविधान ने दिया है, पर भूतों को ठिकाने लगाने की कोई ज़िम्मेदारी पुलिस महकमे को नहीं दी गई है।
भूत धारा 302 या 420 में नहीं आते।"
निराश होकर डरे-सहमे लालाओं ने तय किया कि अब किसी सिद्ध तांत्रिक की तलाश की जाए जो हरिद्वारी की आत्मा को मुक्ति दिला सके।
भूत नहीं, 'भोला' निकला
यह पंचायतें और कार्यवाहियां चल ही रही थीं कि देर शाम आंधी के माफ़िक एक और ख़बर पेट्रोल पम्प से लेकर आर्मी कैंप तक सरसराती हुई फैल गई।
पता चला कि भूत-वूत कुछ नहीं है, हरिद्वारी की दुकान के ऐन बगल में सचमुच समोसे-पकौड़े की एक ठेली लग गई है।
हिम्मत जुटाकर लोग-बाग झुंड बनाकर वहां पहुंचे। पास जाकर देखा तो वह हरिद्वारी का भूत नहीं, बल्कि भला-चंगा 'भोला' था।
भोला—वह खामोश लड़का जो सालों से हरिद्वारी की दुकान की कालिख भरी पिछली कोठरी में भट्टी झोंकता था, बर्तन मांजता था और चुपचाप कोयले ढोता था।
लोगों ने राहत की लंबी सांस ली और अपनी दबी हुई भूख के हाथों मजबूर होकर खुराक का ऑर्डर दिया।
पर जैसे ही पकौड़ी का पहला निवाला मुंह में गया, खाने वाले दंग रह गए। उनके रोंगटे खड़े हो गए।
यह तो हू-ब-हू वही स्वाद था! वही खट्टी-मीठी चटनी, वही लहसुन-धनिए की अचूक तासीर। आत्मीय स्वाद के उस झटके से शरीरों में रोमांच की शाखें फूट पड़ीं।
स्वाद का नशा ऐसा चढ़ा कि अनुभवी लोग 'ड्राई एरिया' घोषित रुद्रप्रयाग में भी मिनटों में सुरा (शराब) का जुगाड़ कर लाए।
ठेली के चारों ओर अच्छी-खासी महफ़िल जम गई। भोला का सारा माल घंटे भर में ही साफ हो गया।
फिर तो भोला की किस्मत चमक उठी। रोज़ शाम ढलते ही वह ठेली लगाता, ग्राहकों की भूख शांत करता।
और अंधेरा गहराने से पहले अपनी पोटली में रुपए दबाकर घर चला जाता।
असली कारीगर का पर्दाफ़ाश और भागते बहादुर
भोला ने कुछ महीने जमकर कमाई की। फिर एक दिन वह अचानक ठेली समेटकर, नए ठीए की तलाश में हमेशा के लिए यूपी चला गया।
उसके जाने के बाद जब बाज़ार ने खालीपन में माथापच्ची की, तब जाकर सबसे बड़े रहस्य से पर्दा उठा।
दरअसल, हरिद्वारी तो महज़ एक चेहरा था। वह केवल विक्रेता था जो गल्ले पर बैठकर हाम दिखाता था।
उस स्वाद का असली जादूगर, माल तैयार करने वाला खानसामा तो कोठरी के अंधेरे में बैठा भोला ही था!
वह हरिद्वारी का करिंदा था और जिन पकवानों को बाज़ार हरिद्वारी की विरासत समझता था, वे दरअसल भोला की ही ईजाद की हुई रेसिपी थीं।
सच क्या है यह तो भगवान ही जाने, पर भोला के जाने के बाद उस खौफ़नाक रात का एक सच और सामने आया।
सुना गया कि उस रात जब कुछ दीवाने "संगम" या "रंगीली" के सुरूर में घर लौट रहे थे।
तो भोला महज़ रात की शांति का फ़ायदा उठाते हुए बैंक के बैंड (मोड़) पर अपनी ठेली का मिज़ाज परख रहा था।
वह यह नाप रहा था कि कहीं उसकी ठेली से दिन के वक़्त यातायात बाधित तो नहीं होगा।
या कोई तेज़ रफ़्तार वाहन घुमाव पर उसकी ठेली से तो नहीं टकरा जाएगा।
अंधेरे में ठेली खिसकाते भोला को देखकर ही उन शराबियों ने उसे भूत समझ लिया था।
कहते हैं।
डरकर भागते उन बहादुरों के पीछे भोला कुछ दूर तक भागा भी था, ताकि उन्हें आवाज़ देकर अपनी सफ़ाई दे सके और उनका भ्रम दूर कर सके।
लेकिन रात के अंधेरे में भूत को अपने पीछे भागता देख वे धावक ऐसी दोगुनी रफ़्तार से चंपत हुए कि मुड़कर पीछे नहीं देखा।
उपसंहार: बाज़ार की भेंट चढ़ता पहाड़
यह उन दिनों की बात है जब बाज़ार हिमालय के इस बियाबान में अपनी जड़ें जमाने के लिए मार्केटिंग के नए-नए फंडे आज़मा रहा था।
तब कौन जानता था कि एक दिन ऐसा आएगा जब पहाड़ का सारा हुनर, सारे 'भोले' बेहतर कल की तलाश में मैदानों की ओर पलायन कर जाएंगे।
आज रुद्रप्रयाग के उस मोड़ पर कोई ठेली नहीं लगती। वहां अब कांच के दरवाज़ों वाले शोरूम हैं और पैकेटबंद स्वाद हैं।
तब कौन जानता था कि आने वाले सालों में भोला की राह पर चलता पूरा पहाड़ बस! बाज़ार भर रह जाएगा।
एक ऐसा बाज़ार, जहाँ सब कुछ बिकेगा—समोसे भी, चटनी भी और पहाड़ की आबोहवा भी।
बस वह पुराना आत्मीय स्वाद और हरिद्वारी जैसी 'हाम' हमेशा के लिए खो जाएगी।