भूत समोसे और पहाड़ का बाज़ार
कांच के शो-केस और बेनूर यादें
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अध्याय 2

कांच के शो-केस और बेनूर यादें

भोला के जाने के बाद रुद्रप्रयाग के उस मोड़ पर जो सन्नाटा पसरा, वह सिर्फ ग्राहकों की कमी नहीं थी, बल्कि एक युग का अंत था। बाज़ार, जो अब तक रिश्तों और किंवदंतियों के भरोसे चलता था, अब 'सिस्टम' और 'ब्रांडिंग' के चंगुल में फंसने लगा था। "असली हरिद्वारी" का बोर्ड भोला को गए अभी साल भर भी नहीं बीता था कि उस पुराने ठीए पर। जहाँ कभी धूल और कोयले की कालिख का राज था, रातों-रात नीले रंग के चमकदार टिन की चादरें चढ़ गईं। कुछ ही दिनों में वहां एक बड़ा सा बोर्ड टंग गया— "न्यू हरिद्वारी स्वीट्स: 1960 से आपकी सेवा में।" हैरत की बात यह थी कि हरिद्वारी का कोई वारिस नहीं था। पर बाज़ार के नए खिलाड़ियों ने उसकी 'हाम' और उसके 'नाम' की कीमत समझ ली थी। दुकान अब कांच के बड़े-बड़े शो-केसों से सज गई थी। वहां अब पकौड़ियां खुले में नहीं, बल्कि चमचमाती ट्रे में सजाकर रखी जाती थीं। काउंटर पर हरिद्वारी जैसा कोई रसिक नहीं, बल्कि एक सफेद एप्रन पहने लड़का बैठता था। जो मुस्कराता तो था, पर उसकी मुस्कराहट में 'कच्ची' वाला वह बेबाकपन नहीं था। स्वाद की तलाश और पुरानी मंडली वही पुराने रसिक, जो कभी संगम का शो देखकर लौटते हुए भूत से डरे थे, अब नए-नवेले शो-रूम के बाहर जमा हुए। जगनलाल ने संशय के साथ पहला समोसा उठाया। समोसा साइज़ में बड़ा था, घी में डूबा हुआ और दिखने में बेहद खूबसूरत। लेकिन जैसे ही उन्होंने चटनी के साथ पहला निवाला लिया, उनकी आँखें वो 'तासीर' नहीं ढूंढ पाईं। "अरे भाई, इसमें वो लहसुन की धमक कहाँ है? वो धनिए की तीखी खुशबू कहाँ गई?" जगनलाल ने शिकायत की। काउंटर वाले लड़के ने पेशेवर अंदाज़ में जवाब दिया, "सर, अब हम हाइजीन का ध्यान रखते हैं। लहसुन कम डालते हैं ताकि एसिडिटी न हो। ये चटनी मशीन से बनी है, हाथ की सिल-बट्टे वाली नहीं।" जगनलाल चुप हो गए। बाज़ार ने उन्हें 'हाइजीन' तो दे दिया था, लेकिन वो 'रूह' छीन ली थी जो भोला की गंदी सी कोठरी में पकती थी। अब स्वाद 'जीभ' के लिए नहीं, बल्कि 'पेट' भरने के लिए रह गया था। बाज़ार का नया साया रुद्रप्रयाग का भूगोल बदल रहा था। संगम के पास अब कंक्रीट के लेंटर पहाड़ों को ढंकने लगे थे। अब रात को 12 बजे कोई "संगम" देखकर लौटता, तो उसे सड़क किनारे कोई ठेली नहीं दिखती। अब वहां सीसीटीवी कैमरों की लाल बत्तियां टिमटिमाती थीं। डर अब भूत का नहीं था, डर अब 'जुर्माने' और 'चालान' का था। पुराने लोग बताते हैं कि कभी-कभी आज भी कोहरे वाली रातों में, जब बैंक के उस मोड़ पर सन्नाटा होता है। तो पुरानी कड़ाही के झनझनाने की आवाज़ आती है। लोग कहते हैं कि शायद भोला की यादें आज भी वहां उस स्वाद को ढूंढ रही हैं। जिसे बाज़ार ने विज्ञापन के रंगीन पोस्टरों के नीचे दफन कर दिया है। तभी तो "भौं कुछ" का यह सच बार-बार कचोटता है—कि जिस दिन हमने स्वाद को 'मार्केटिंग' की तराजू पर तौला, उसी दिन हमारा पहाड़ 'बाज़ार' की भेंट चढ़ गया। भोला की चिट्ठी कहानी में एक नया मोड़ तब आया जब डाकिए ने एक पुरानी, धूल भरी चिट्ठी जगनलाल को लाकर दी। चिट्ठी यूपी के किसी अनजान कस्बे से आई थी। लिखने वाला कोई और नहीं, भोला ही था। चिट्ठी में कोई पता नहीं था, बस एक लाइन लिखी थी: "लाला जी, शहर में समोसे तो बिकते हैं, पर वहां अलकनंदा का पानी नहीं है। पानी के बिना चटनी का वो मिज़ाज नहीं बनता। मैं वहां भी 'भूत' ही हूँ।"

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