ब्रांड का शोर और पहाड़ की खामोशी
भोला की उस बेनाम चिट्ठी ने रुद्रप्रयाग के पुराने रसिकों के बीच एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी थी।
वह चिट्ठी महज़ कागज़ का टुकड़ा नहीं थी, बल्कि एक चेतावनी थी कि जो स्वाद हम खो चुके हैं।
उसे अब 'हाइजीन' और 'कांच के शो-केस' कभी वापस नहीं ला पाएंगे।
दलाल और दिल्ली का 'पहाड़ी स्वाद'
'न्यू हरिद्वारी स्वीट्स' की चमक अब बाज़ार की सबसे बड़ी चकाचौंध बन चुकी थी।
एक शाम जब जगनलाल अपनी पुरानी टोली के साथ संगम के किनारे पत्थर पर बैठे थे।
तो उन्हें पता चला कि इस दुकान का असली मालिक कोई स्थानीय लाला नहीं, बल्कि दिल्ली का एक बड़ा फूड-चेन ग्रुप है।
उन्होंने 'हरिद्वारी' के नाम का ट्रेडमार्क खरीद लिया था। अब रुद्रप्रयाग के उस मोड़ पर मिलने वाले समोसे केवल वहां नहीं बिक रहे थे।
बल्कि दिल्ली के मॉल्स में 'पहाड़ी समोसा: द ऑथेंटिक टेस्ट ऑफ रुद्रप्रयाग' के नाम से पांच गुना कीमत पर बेचे जा रहे थे।
"विडंबना देखिए जगन भाई," मास्टर जी ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, "जिस हरिद्वारी को जीते जी ढंग की धोती मयस्सर नहीं हुई।
आज उसका नाम एयर-कंडीशन्ड कमरों में करोड़ों का टर्नओवर दे रहा है।"
वह आखिरी 'साया'
कहते हैं कि एक रात, जब पूरा बाज़ार शटर गिराकर सो चुका था और अलकनंदा का शोर रात के सन्नाटे को चीर रहा था।
बाज़ार के चौकीदार 'खिमुआ' ने कुछ अजीब देखा।
वह पुराने बैंक के मोड़ से गुज़र रहा था। उसने देखा कि 'न्यू हरिद्वारी' के चमकदार बोर्ड के नीचे, जहाँ अब एक बड़ा डस्टबिन रखा रहता है।
वहां कोई धुंधली सी आकृति बैठी है। खिमुआ को लगा कोई नशेड़ी होगा, लेकिन पास जाने पर उसकी रूह कांप गई।
वहां कोई बैठा नहीं था, बस एक मसालेदार खुशबू तैर रही थी—वही पुरानी, लहसुन और ताज़ा धनिए वाली खुशबू, जो भोला की ठेली से आया करती थी।
खिमुआ ने कसम खाकर बताया कि उसे अंधेरे में किसी के झर्ना चलाने की हल्की सी आवाज़ सुनाई दी। वह हरिद्वारी का भूत नहीं था, और न ही वह भोला था।
वह शायद रुद्रप्रयाग की आत्मा थी, जो अपना खोया हुआ अस्तित्व तलाश रही थी।
बाज़ार का आखिरी दांव
अब पहाड़ में 'होमस्टे' बन रहे थे, 'कैफे' खुल रहे थे और हर जगह बोर्ड लगे थे— "Feel the Nature"।
लेकिन उस प्रकृति को महसूस करने वाले लोग अब 'कन्ज्यूमर' बन चुके थे। भोला की वह बात सच साबित हो रही थी कि "पानी के बिना चटनी का मिज़ाज नहीं बनता।"
पहाड़ का पानी अब बोतलों में बंद होकर बिकने लगा था। और जिस दिन पानी बाज़ार की वस्तु बन गया।
उसी दिन चटनी का वो देसी तीखापन हमेशा के लिए 'मैकेनिकल' हो गया।
"भौं कुछ" का यह अध्याय एक कड़वी हकीकत पर खत्म होता है:
बाज़ार ने हमें सब कुछ दिया—सुविधा, चमक, रसीदें और पैकेजिंग।
बस उसने हमसे वो 'वक्त' छीन लिया जब हम एक समोसे के लिए भूत से भी लड़ने का दम रखते थे।