बगावत और पहाड़ों की पनाह
आखिरी फैसला
आर्यन ने अवनि का हाथ पकड़कर उसे माहिरा से दूर किया। उसकी आवाज इतनी शांत थी कि डरावनी लग रही थी।
आर्यन: "अवनि, ये हाथ तुमने माहिरा पर नहीं, मेरे वजूद पर उठाया है। आज के बाद मेरा और तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं।"
विक्रम खन्ना (गुस्से में कांपते हुए): "आर्यन! होश में आओ। अगर आज तुम इस लड़की के लिए इस घर से निकले।
तो याद रखना... खन्ना खानदान का वारिस होने का हक खो दोगे। ये गाड़ियां, ये बैंक बैलेंस, ये रुतबा—सब छिन जाएगा।"
आर्यन ने अपनी जेब से कार की चाबी और अपना वॉलेट निकालकर पास की मेज पर रख दिया। उसने माहिरा का हाथ थाम लिया, जिसके गाल पर अभी भी उंगलियों के निशान उभरे हुए थे।
आर्यन: "डैड, आपने मुझे चीजें दीं, पर कभी जीना नहीं सिखाया। वो मुझे इस 'मामूली' लड़की ने सिखाया है।
मुझे आपके रुतबे की जरूरत नहीं, मुझे इसकी रूह की जरूरत है।"
अंधेरी रात और लंबा सफर
आर्यन और माहिरा बिना किसी सामान के उस घर से बाहर निकल गए। दिल्ली की सड़कों पर रात के 2 बज रहे थे। उनके पास न गाड़ी थी, न रहने का ठिकाना।
माहिरा (सिसकते हुए): "आर्यन, मेरी वजह से तुमने सब कुछ खो दिया। तुम वापस चले जाओ, मैं बोझ नहीं बनना चाहती।"
आर्यन बीच सड़क पर रुक गया। उसने माहिरा के दोनों कंधे पकड़े और उसकी आँखों में झांका।
आर्यन: "माहिरा, जिस घर में तुम नहीं, वो घर मेरे लिए कब्रिस्तान था। अब हम वहां जा रहे हैं जहाँ हमारी कहानी शुरू हुई थी। वापस शिमला।"
आर्यन ने अपने एक पुराने दोस्त को फोन किया और उससे अपनी पुरानी जीप मांग ली। वे रात के अंधेरे में ही पहाड़ों की ओर निकल पड़े।
दिल्ली की रोशनी पीछे छूट रही थी और सामने थे घने अंधेरे पहाड़, जहाँ उनकी असल परीक्षा शुरू होने वाली थी।
हवेली में वापसी
अगली सुबह जब वे 'विंटेज पैलेस' पहुँचे, तो हवेली पहले से ज्यादा वीरान और ठंडी लग रही थी। लेकिन इस बार उन दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए साफ अहसास था।
आर्यन ने पुराने जेनरेटर को चालू किया और माहिरा ने बिखरी हुई चीजों को समेटना शुरू किया।
माहिरा: "आर्यन, यहाँ हमारे पास बिजली-पानी के भी पैसे नहीं होंगे। हम कैसे जिएंगे?"
आर्यन (मुस्कुराते हुए): "मैं नक्शे बनाऊंगा और तुम उन्हें रंगों से भरोगी।
ये हवेली हमें काम देगी, माहिरा। हम इसे अपनी मेहनत से खड़ा करेंगे।"
सुकून और सुलगती साजिश
कुछ दिन शांति से बीते। आर्यन कुल्हाड़ी लेकर लकड़ियाँ काटता, आग जलाता और माहिरा उसके लिए चूल्हे पर चाय बनाती।
उन दोनों के बीच अब कोई 'आर्किटेक्ट' या 'पेंटर' नहीं था, बस दो दिल थे जो एक-दूसरे की धड़कन पढ़ रहे थे।
एक शाम, जब माहिरा हवेली की बालकनी में खड़ी ढलते सूरज को देख रही थी, आर्यन पीछे से आया और उसने माहिरा के गले में वही 'लाल धागा' बांध दिया जिसे उसने दिल्ली में बचाया था।
आर्यन: "ये धागा अब कभी नहीं टूटेगा।"
लेकिन तभी हवेली के नीचे कुछ गाड़ियां आकर रुकीं।
आर्यन ने खिड़की से देखा—वे सरकारी गाड़ियाँ थीं। एक अफसर बाहर निकला और चिल्लाकर बोला:
अफसर: "मिस्टर आर्यन खन्ना! आपके पिता ने इस हवेली को 'अवैध संपत्ति' घोषित करवा दिया है। आपके पास 24 घंटे हैं इसे खाली करने के लिए, वरना यहाँ बुलडोजर चलेगा।"
पीठ में खंजर
आर्यन हैरान रह गया। उसे यकीन नहीं था कि उसके पिता इस हद तक गिर जाएंगे। तभी माहिरा के पास एक मैसेज आया। यह रोहन का था।
उसमें लिखा था: "माहिरा, अगर तुम अभी मेरे पास वापस आ जाओ, तो मैं आर्यन की हवेली और उसका करियर बचा सकता हूँ। फैसला तुम्हारा है—आर्यन की बर्बादी या मेरा साथ।"
माहिरा का फोन उसके हाथ से गिर गया। वह समझ गई कि यह सब उसे तोड़ने के लिए किया जा रहा है।
माहिरा की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। एक तरफ वो हवेली थी जिसे आर्यन अपनी रूह से ज्यादा प्यार करता था, और दूसरी तरफ उसकी अपनी खुशी।
उसने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ बुलडोजर खड़े थे और आर्यन उन अफसरों से लड़ रहा था।