मोहब्बत की कुर्बानी
एक खामोश फैसला
माहिरा ने अपने आँसू पोंछे और आईने में खुद को देखा। उसने वही पीला मफलर पहना जो उनकी पहली मुलाकात की गवाह था।
उसने एक कागज उठाया और कांपते हाथों से आर्यन के लिए एक आखिरी खत लिखा।
"आर्यन, तुमने मेरे लिए अपना घर छोड़ा, अपना रुतबा छोड़ा। अब मेरी बारी है। मैं तुम्हें सड़कों पर नहीं देख सकती।
ये हवेली तुम्हारी पहचान है, इसे टूटने मत देना। शायद हमारे धागे यहीं तक थे।"उसने रोहन को मैसेज कर दिया— "मैं आ रही हूँ। बुलडोजर रुकवा दो।"
हवेली का सन्नाटा
आर्यन बाहर अफसरों को समझा रहा था कि तभी रोहन की गाड़ी वहां पहुँची। रोहन के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान थी।
उसने हाथ के इशारे से बुलडोजर रुकवा दिए। आर्यन हैरान था कि अचानक ये कैसे हुआ?
तभी माहिरा हवेली से बाहर निकली। उसका चेहरा पत्थर जैसा शांत था।
आर्यन (दौड़कर उसके पास जाते हुए): "माहिरा! देखो, इन्होंने काम रोक दिया है। शायद डैड मान गए..."माहिरा (रुखी आवाज में): "कोई नहीं माना है आर्यन।
मैं अपनी मर्जी से रोहन के साथ जा रही हूँ। मुझे एहसास हो गया है कि बिना पैसों और आराम के पहाड़ों में रहना मेरे बस की बात नहीं है।"
आर्यन के पैरों तले जमीन खिसक गई। "तुम... तुम ये क्या कह रही हो? अभी कल ही तो तुमने कहा था कि हम साथ मिलकर सब ठीक करेंगे।"
माहिरा: "कल की बातें कल की थीं। रोहन मुझे वो सब दे सकता है जो तुम कभी नहीं दे पाओगे। गुडबाय आर्यन।"
वो रोहन की गाड़ी में जाकर बैठ गई। रोहन ने आर्यन की तरफ देख कर एक विजयी मुस्कान दी और गाड़ी पहाड़ों के मोड़ पर ओझल हो गई।
टूटता हुआ गुरूर
आर्यन वहीं घुटनों के बल बैठ गया। जिस हवेली को बचाने के लिए उसने सब कुछ दांव पर लगाया था, आज वो हवेली तो बच गई थी, लेकिन उसकी रूह चली गई थी।
उसने चीखकर माहिरा का नाम पुकारा, पर सिर्फ पहाड़ों की गूंज वापस आई।
वो पागलों की तरह हवेली के अंदर भागा। उसे लगा शायद ये कोई मजाक है। वहां उसे मेज पर वो 'अधूरा खत' मिला।
जैसे ही उसने खत पढ़ा, उसकी आँखों से खून के आँसू निकल पड़े। उसे समझ आ गया कि माहिरा ने उसे बचाने के लिए खुद को बेच दिया है।
दिल्ली की कैद
माहिरा अब रोहन के आलीशान घर में थी। रोहन ने उसे एक सुनहरे पिंजरे में कैद कर दिया था। वहां न रंग थे, न कैनवास, और न ही आर्यन की वो सुकून भरी बातें।
रोहन ने माहिरा का पासपोर्ट और फोन जब्त कर लिया था।रोहन: "अब तुम कभी उस आर्किटेक्ट का चेहरा नहीं देख पाओगी। अगले हफ्ते हमारी शादी है।"
माहिरा बस एक बुत की तरह खिड़की से बाहर देखती रहती। उसने खाना-पीना छोड़ दिया था। उसकी कलाई पर बंधा वो लाल धागा अब काला पड़ने लगा था।
आर्यन का पुनर्जन्म
शिमला में, आर्यन अब वो पुराना आर्यन नहीं रहा था। उसने अपनी आँखों से वो मासूमियत निकाल फेंकी थी। उसने हवेली के कोने में पड़ी अपनी पुरानी फाइल्स निकालीं।
आर्यन (खुद से, एक नई आग के साथ): "तुमने मेरे लिए खुद को दांव पर लगाया माहिरा... अब मैं तुम्हें उस नरक से निकालूंगा।
लेकिन अब मैं एक मामूली आर्किटेक्ट बनकर नहीं, बल्कि आर्यन खन्ना बनकर आऊंगा, जिससे दुनिया डरेगी।"
उसने अपने पिता को फोन लगाया।
आर्यन: "डैड, मैं वापस आ रहा हूँ। मुझे बिजनेस चाहिए, मुझे पावर चाहिए।
और बदले में, मुझे वो सब चाहिए जो रोहन ने मुझसे छीना है।"धागे अब नफरत और बदले की आग में तपने वाले थे।
दिल्ली का आसमान अब धूल और धुएं से भरा था, लेकिन आर्यन खन्ना के सीने में जो आग थी, वह इस शहर की सबसे ऊंची इमारत से भी ज्यादा दहक रही थी।