इंटरव्यू और वो डरावना केबिन
ज़ोया का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। 'रायचौधरी कॉर्पोरेशन' का 45वाँ फ्लोर कांच और स्टील का एक भूलभुलैया जैसा था।
उसे एक बड़े से वेटिंग एरिया में बिठाया गया, जहाँ पहले से ही शहर के टॉप आर्किटेक्ट्स सूट-बूट पहनकर बैठे थे।
उनके बीच ज़ोया अपनी कुर्ती और हाथ में पकड़े हाथ से बनाए गए स्केचेस के साथ थोड़ी अलग और घबराई हुई लग रही थी।
तभी सेक्रेटरी की आवाज़ गूंजी, "मिस ज़ोया खान, मिस्टर रायचौधरी के केबिन में चलिए।"
सबकी निगाहें ज़ोया पर टिक गईं। फुसफुसाहट शुरू हुई— "इसे सीधे बॉस के केबिन में? आज तक कोई इंटरव्यू के लिए वहां नहीं गया!"
ज़ोया ने गहरी सांस ली और उस भारी लकड़ी के दरवाजे की ओर बढ़ी। दरवाजा खुला और अंदर का नजारा देखकर उसकी रूह कांप गई।
केबिन बहुत बड़ा था, लेकिन वहां रोशनी बहुत कम थी। बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर गहरे रंग के पर्दे थे। सामने की बड़ी सी रिवॉल्विंग चेयर की पीठ दरवाज़े की तरफ थी। वहां कोई बैठा था, लेकिन चेहरा नहीं दिख रहा था।
"बैठिए, मिस ज़ोया," एक भारी, ठंडी और रोबीली आवाज़ आई।
ज़ोया को वह आवाज़ जानी-पहचानी लगी, पर वह डर के मारे कांप रही थी। "जी... नमस्ते सर। मैं ज़ोया खान, आर्किटेक्ट..."
"मैंने सुना है आपको यहाँ का बॉस एक 'राक्षस' लगता है?" चेयर धीरे से घूमी।
ज़ोया की आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने वही लड़का बैठा था जो उसे लिफ्ट में मिला था—वही नीला शर्ट, वही चश्मा।
लेकिन अब उसकी आंखों में वो मासूमियत नहीं, बल्कि एक शिकारी जैसी तेज़ी थी।
"क... कबीर? तुम? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" ज़ोया हकलाने लगी। "क्या तुम सच में... असिस्टेंट हो और बॉस की कुर्सी पर बैठ गए? भागो यहाँ से, वरना वो बुड्ढा आ गया तो तुम्हारी नौकरी चली जाएगी!"
कबीर ने मेज पर रखा अपना नेमप्लेट सीधा किया, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था: कबीर रायचौधरी - CEO।
ज़ोया को लगा जैसे ज़मीन खिसक गई हो। उसकी जीभ तालू से चिपक गई। "आप... आप ही मिस्टर रायचौधरी हैं?"
कबीर अपनी कुर्सी से उठा और धीरे-धीरे ज़ोया की तरफ बढ़ा। उसकी लंबी कद-काठी और रसूख ज़ोया को छोटा महसूस करा रहे थे।
"लिफ्ट में तुम बहुत बोल रही थी। प्यून, ड्राइवर, राक्षस... और क्या-क्या कहा था?"
ज़ोया ने आँखें बंद कर लीं। "आई एम सो सॉरी सर! मुझे नहीं पता था कि आप... आप इतने यंग और... मेरा मतलब है..."
"डिजाइन दिखाइए," कबीर ने अचानक रुख बदलते हुए कहा।
ज़ोया ने कांपते हाथों से अपना पोर्टफोलियो मेज पर रख दिया। कबीर ने बड़ी बारीकी से स्केचेस देखे। एक पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।
कबीर की नज़रें ज़ोया के एक डिज़ाइन पर रुक गईं—वह एक पुराने अनाथालय को नए तरीके से बनाने का आइडिया था।
"यह डिज़ाइन किसी अमीर क्लाइंट के लिए नहीं है," कबीर ने बिना सिर उठाए कहा।
"सर, आर्किटेक्चर सिर्फ पैसा कमाने के लिए नहीं होता, यादें सहेजने के लिए भी होता है," ज़ोया ने हिम्मत जुटाकर कहा।
कबीर ने उसकी आँखों में देखा। पहली बार उसे लगा कि कोई उसे उसके पैसों के लिए नहीं, बल्कि उसके काम के लिए चुनौती दे रहा है।
"कल से काम पर आ जाना," कबीर ने रूखेपन से कहा। "लेकिन एक शर्त है। ऑफिस में कोई नहीं जानता कि मैं कैसा दिखता हूँ।
सबके लिए मैं अभी भी वही 'असिस्टेंट' रहूँगा। और अगर तुमने मेरा राज खोला..."
"तो?" ज़ोया ने पूछा।
कबीर उसके और करीब आया, "तो मैं सच में वो 'राक्षस' बन जाऊँगा जिसका ज़िक्र तुमने लिफ्ट में किया था।"